रात की बेचैनी, सुबह का सुकून हो;
सर्दी की गर्मी, गर्मी की सर्दी हो।
पहर-दोपहर, फिर ढलते सूरज का नूर हो;
ख़याल-ओ-ख़्याली की कशिश हो।
कुछ पाने की, कुछ खोने की तलब हो;
हो तो जाने की, न हो तो आने की बेचैनी हो।
तुम ही हो…
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तुम ही हो…
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दर्द की तर्जीह
बे-रंग नहीं, मैं आधा ज़िंदा हूँ इन रंगों में,
एक सुकून भी छुपा है मेरी ही बे-चैनियों में।खुद को ढूँढने निकला था तेरी यादों के रास्तों पर,
पर तुझे खोना भी कब से शामिल है मेरी रज़ाओं में।तुझे भूल जाना चाहता हूँ…
मगर यादें इंसान से ज़्यादा वफ़ादार होती हैं।शायद आदत पड़ जाए खामोश रहने की,
पर कुछ आदतें जान नहीं लेतीं —
खुद को मार देती हैं।आज कुछ टूटा नहीं…
आज मैं पूरी तरह गिर पड़ा हूँ,
इतना कि खुद को उठाने का भी मन नहीं।ये हार प्यार से नहीं लगी —
ये वार मेरे अपने होने पर हुआ है।कभी सोचता हूँ, किसी पहाड़ पर तू मिल जाए…
तो क्या मैं पुकारूँगा?
नहीं।
शायद बस दूर खड़ा रहूँगा —
तेरी आवाज़ को हवा में महसूस करते हुए,
और सोचूँगा…
शायद जो खोया, वही मेरी किस्मत था।किसी ने सच कहा था —
कुछ नहीं रखा इस प्यार में।
प्यार में सबसे ज़्यादा दर्द जुदाई का नहीं,
प्यार के खत्म होने का होता है।तन्हाई ने मुझे एक राज़ बताया —
दिल सिर्फ टूटता नहीं…
कभी-कभी वो बिना आवाज़ राख भी बन जाता है।और लोग पूछते हैं —
“तू ठीक तो है?”
काश मैं कह पाता…
“मैं अब मौजूद नहीं।”पर एक सच्चाई और है —
दर्द मुझे खत्म नहीं करेगा।
मैं इस दर्द को गले लगाऊँगा,
क्योंकि यही अब आख़िरी चीज़ है
जो तुझे मुझसे जोड़ती है।तू गया… पर दर्द रह गया।
और सच कहूँ —
तेरे जाने से ज़्यादा,
मुझे इस दर्द से मोहब्बत हो गई है। -
मैखाने में नादारद
मैखाने में नादारद, एक दस्तक-सी ज़िन्दगी;
कभी चंद ख़ुशनुमा लम्हों की मोहताज-सी।
ग़म के नग़्मों में, अकेले एक साथ बन गई;
और एक और जाम के इंतज़ार में, ज़िन्दगी बदलती गई…सितारों से पूछी मैंने अपनी तन्हाई की कहानी;
उन्होंने कहा — यह राहगुज़र है वीरानियों की।
कभी रात के साये में, चाँदनी की आरज़ू-सी;
कभी सुबह के उजाले में, ख़्वाबों की तलाश-सी…राहों में बिछी चुप्पियों की चादर को,
महसूस किया मैंने हर क़दम पर;
साँसों में बसी एक अनकही तड़प,
और दिल में छुपी एक बेक़रार चाहत…फिर भी, उम्मीद की किरणों से रोशन यह जीवन;
हर दर्द में छिपा है एक नया सवेरा,
हर आँसू के पीछे एक मुस्कान की चाह —
और हर अँधेरे के बाद, एक नई सुबह की आस। -
आजकल की गुफ़्तगू
यूँ तो हर रोज़ सुबह होती ही है,
दिन भी गुज़र ही जाता है किसी तरह से।
पर कुछ तो है — एक ख़लिश-सी,
जो मन के किसी कोने में चुपचाप छुपी रहती है।एक कशमकश है, जो हर रोज़ रूबरू होती है;
दिल पर छा जाती है — बेबस कर जाती है।सोचें तो जीवन में सब कुछ पाया है;
आजकल के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं लगता।एक उम्मीद से भी ना-उम्मीद-सी ख़्वाहिश,
एक फ़रियाद से भी बड़ी नज़्म कहने चली —
कुछ पा लेने की, कुछ खो देने की।बस यही है, आजकल मेरी गुफ़्तगू…
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दिल-ए-मजबूरी
तेरी आरज़ू की कैसी ये ख़लिश है —
तुझसे मिलकर भी जुदा हूँ,
तुझसे दूर रहकर भी ख़फ़ा हूँ।वक़्त-ए-तकलीफ़ के तराज़ू में
तौलूँ भी कैसे ये जुस्तजू?
तकलीफ़ तो क़िस्मत की है —
दिल की क्या ग़लती?पर दिल-ए-मजबूरी तो तुम ही हो…
और तुम ही रहोगे। -
जहाँ हम कभी मिलते थे
खो गया हूँ मैं कहीं इन वादियों में;
ऐसा बता देना, दो-चार लोग पूछें तो —
तुम, और तुम्हारे लिए ही बता रहा हूँ:
मिलूँगा मैं वहीं, जहाँ हम कभी मिलते थे… -
महफ़िल में तन्हा
तेरे चेहरे को देख-देख,
यूँ ही हँसते-हँसाते रहे,
तुझे पता भी ना था,
किसी किनारे हम भी बैठे थे।
तेरे मेरे बीच के दरमियाँ से
कहे भी तो क्या बेकार में,
तुम पूछती तो कुछ कहते, लेकिन
महफ़िल में तन्हा तो हम ही थे… -
काश बता पाते
काश बता पाते तुम्हें,
इतना ही जता पाते,
चाहते ना चाहते समझाते बुझाते,
कितनी मोहब्बत करने लगे हैं।
रोज़ एक नई उम्मीद सी उमड़ती हो,
थोड़ा प्यार देती तो बगीचा ही बन जाते,
पहले शब्द नहीं अक्स बतलाते,
समझ जाती नहीं तो आंखों में दिखाते।
एक दिन झुकी नजरों को देखोगी,
सोचा था खुद ही समझ जाओगी,
आजकल तुम्हें देखती भी नहीं,
खैर छोड़ो, अब जान लो…
कितनी मोहब्बत करने लगे हैं तुमसे… -
ज़िन्दगी का खेल
ज़िन्दगी भी मस्त खेलती है —
मैं चलना सीखता हूँ, ये भागने लगती है;
मैं भागना सीखता हूँ, ये रुक जाती है;
मैं रुकना सीखता हूँ, ये बदल जाती है;
मैं बदलना सीखता हूँ, ये समझ नहीं आती;
मैं समझना सीखता हूँ, ये उलझ जाती है;
मैं सुलझाना सीखता हूँ — ये फिर चलने लगती है।
मैं फिर चलना सीखता हूँ… -
जाने क्या बात है
जाने क्या बात है, आज गुनगुना-सा मिज़ाज है;
बता पाना तो चाहता हूँ, पर न जाने क्या बात है, जो रोके जा रही है फिर भी।कुछ तो है इस वक़्त के दरमियाँ —
मेरी एक छोटी-सी और कहानी, लफ़्ज़ दो लफ़्ज़ की एक और जवानी।जाने क्या बात है, विरत-सा मन आज है;
चंद लम्हे ही तो थे, न जाने मन क्यों उदास है।रुख़ से, रुक-रुक के आते तो हैं,
पर ज़ुबान समझ नहीं पाती, क्या बात है।एक और किस्सा-सा लगने लगी है अब मुझे मेरी ज़िन्दगी;
जाने क्या बात है — याद भी है, साथ भी;
न कोई रूठा है, न जुदा;
बस, वक़्त के साथ दिल से एक ख़ुशी नहीं,
और आस-पास सब बेकार-सा है — न जाने ऐसी क्या बात है…