दर्द की तर्जीह

Written by

in

बे-रंग नहीं, मैं आधा ज़िंदा हूँ इन रंगों में,
एक सुकून भी छुपा है मेरी ही बे-चैनियों में।

खुद को ढूँढने निकला था तेरी यादों के रास्तों पर,
पर तुझे खोना भी कब से शामिल है मेरी रज़ाओं में।

तुझे भूल जाना चाहता हूँ…
मगर यादें इंसान से ज़्यादा वफ़ादार होती हैं।

शायद आदत पड़ जाए खामोश रहने की,
पर कुछ आदतें जान नहीं लेतीं —
खुद को मार देती हैं।

आज कुछ टूटा नहीं…
आज मैं पूरी तरह गिर पड़ा हूँ,
इतना कि खुद को उठाने का भी मन नहीं।

ये हार प्यार से नहीं लगी —
ये वार मेरे अपने होने पर हुआ है।

कभी सोचता हूँ, किसी पहाड़ पर तू मिल जाए…
तो क्या मैं पुकारूँगा?
नहीं।
शायद बस दूर खड़ा रहूँगा —
तेरी आवाज़ को हवा में महसूस करते हुए,
और सोचूँगा…
शायद जो खोया, वही मेरी किस्मत था।

किसी ने सच कहा था —
कुछ नहीं रखा इस प्यार में।
प्यार में सबसे ज़्यादा दर्द जुदाई का नहीं,
प्यार के खत्म होने का होता है।

तन्हाई ने मुझे एक राज़ बताया —
दिल सिर्फ टूटता नहीं…
कभी-कभी वो बिना आवाज़ राख भी बन जाता है।

और लोग पूछते हैं —
“तू ठीक तो है?”
काश मैं कह पाता…
“मैं अब मौजूद नहीं।”

पर एक सच्चाई और है —
दर्द मुझे खत्म नहीं करेगा।
मैं इस दर्द को गले लगाऊँगा,
क्योंकि यही अब आख़िरी चीज़ है
जो तुझे मुझसे जोड़ती है।

तू गया… पर दर्द रह गया।
और सच कहूँ —
तेरे जाने से ज़्यादा,
मुझे इस दर्द से मोहब्बत हो गई है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *