Category: Shayari

Shayari and short verses — couplets and ghazal-style lines, mostly in Hindi — on love, separation, and the ache of living.

  • उगते सूरज से ढलते सूरज तक

    पहले पहर में उगते सूरज से तुम ज़िन्दगी में रोशनी लाई, फिर दूसरे पहर में ढलते सूरज सी डूब कर चली भी गई। अब इस लंबी रात में, चाँद के सहारे तुम्हारे इंतजार में ये जीवन बीत रहा है, डर तो इस बात का है, कि अगली सुबह कहीं ग्रहण न हो जाए।

    खैर, वह आँखें और तिल, मेरे नाम पर मुस्कुराते तुम्हारे होंठ, जुल्फों से खेलते हुए उन्हें बांधना तुम्हारा, रूठ के गुस्से में नाक फूलाना, अपने हाथों से मेरे कान पकड़ना। मेरे कंधे पर सिर रखकर तेरा सोना, और मेरा हाथ पकड़ना,

    इन्हें भूल गई हो तुम, जो कि काफी हैं फिलहाल मेरे जीने के लिए।

  • सुनहरी नौका

    अनोखे एक अद्वितीय सफर में, सुनहरी नौका पर सवार,
    शख्स बहुत निकले, फिर मजबूरी में आज।
    ठहर जाने किसी किनारे, मंज़िल की राह,
    ध्यान से देखा तो सोचते अब एक बात।
    भीड़ में ऐसे कितने हैं लोग, साथ मेरे,
    कुछ के चेहरे, कुछ की आंखें,
    कुछ और बोले भी तो क्या,
    एक ही सवाल सभी सोचते, क्यों?
    शाम होते सोचा भीड़ बन जाए आज,
    हिम्मत ने याद दिलाया, घर और ज़रूरतें भी हैं तेरे पास।
    हिम्मत वही पिघल गई, डूबते सूरज जैसी,
    फिर से निकल गए ख्वाबों के पुल बनाते।
    ज़िंदगी के किनारे पर सुनहरी नौका पर सवार।

  • मेरी ही ज़िद

    एक रोज़ उठा तो एक शख्स मेरे पास खड़ा था…
    अलग सी कद-काठी और चेहरा उसका,
    आंखें थीं लेकिन होंठ नहीं,
    बाल थे लेकिन भौंहें नहीं,
    मैं चौंका और पूछा, “कौन हो भाई?”
    धृष्ट वो आदमी वैसे का वैसा खड़ा रहा,
    गुस्सा आया और मैंने पकड़ा,
    फिर भी वह हिला नहीं वहां से।
    मैंने और जोर से कोशिश की,
    जितना उसके पास जाऊं उतना वह मुझपे हावी हो जाए।
    कुछ समझ नहीं पाया,
    तो हार कर पत्नी को जगाया,
    “देखो ये कौन है?”
    पत्नी ने नींद से उठकर बड़बड़ाई,
    “पागल हो गए हो, कोई नहीं है यहां।”
    यह कहकर वह फिर सो गई।
    मैं विचलित मन से उस शख्स को देखता रहा,
    सोचा कि क्या आफत गले पड़ गई,
    धर्म संकट में था तो संकट मोचन को भी याद कर लिया।
    कुछ समझ नहीं आया और शख्स मुझे देखे जाए,
    मेरा पारा चढ़ने लगा,
    और मैंने उसे एक मुक्का मार दिया,
    हुआ कुछ नहीं, मुझे ही दर्द हुआ।
    कराहते हुए बैठ गया और सोचा, “हैं क्या ये बला?”
    मानो जैसे जिद सी सवार हो गई हो मन में,
    बहुत सोचा और समझ आया,
    ये और कोई नहीं, मेरी ही जिद है जिंदगी की।

  • होड़

    होड़ लगी है नंबर लाने की,
    होड़ लगी है डिग्री पाने की,
    होड़ लगी है प्यार करने की,
    होड़ लगी है पैसा कमाने की,
    होड़ लगी है भव्य मकान बनाने की,
    होड़ लगी है बच्चों को सुंदर दिखाने की,
    होड़ लगी है बड़ा मंदिर मस्जिद बनाने की,
    होड़ लगी है दूसरों को छोटा दिखाने की,
    होड़ लगी है इसी होड़ में खो जाने की।

  • इश्क़ की किताब

    इश्क में न चाहते हुए भी जिंदगी की किताब में हजारों पन्ने शायरी के जुड़ जाते हैं,
    और उसकी इश्क में उसकी किताब में कुछ पन्ने इश्क में लहूलुहान भी हो जाते हैं,
    फिर जब वो पन्ने हकीकत में सहने होते, तो समझ नहीं आता…
    कि दिल शायर हो गया है, या दिल में दर्द इतना है…
    जनाब ये इश्क चीज ही ऐसी है।

  • एक ख़्वाहिश

    एक ख़्वाहिश मेरे मन की —
    बारिश हो… और तुम।

    घबराई-हुई-सी एक साँस,
    जो तुम्हारी धड़कनों से टकराकर
    अपनी रफ़्तार भूल जाए;
    कंधा मेरा हो… और सिर तेरा,
    जैसे थककर तुमने दुनिया छोड़ दी हो।

    तुम और मैं —
    एक भी, दो भी;
    भीगते हुए तुम्हारे बाल,
    और मेरे हाथ…
    जो उन्हें सुलझाते-सुलझाते
    तुममें ही उलझ जाएँ।

    वक़्त का पता हो भी… और नहीं भी;
    हर पल ठहरता हुआ,
    हर लम्हा फिसलता हुआ;
    जुस्तजू हो दिल की क़रीबी की,
    हर कोशिश — तुम्हें जानने की,
    और उसी में, अपने दिल को पहचानने की।

    दुनिया से कहीं दूर,
    तुममें यूँ खो जाने की,
    कि लौटने का रास्ता भी याद न रहे।

    ख़लिश हो… तेरे पास आने की,
    और डर भी — कि ये दूरी कहीं हमेशा की न हो जाए;
    डरते हुए तेरा हाथ पकड़ने की,
    जैसे छूट गया, तो सब कुछ बिखर जाएगा।

    तुझे खो देने की बेचैनी भी,
    तुझे पा लेने की बेबसी भी;
    तुझे भूल जाने की हर कोशिश,
    और हर कोशिश में, तुझे और गहराई से पा लेना।

    तेरे लिए ख़ुद को भूल जाने की,
    और उस भूल में, ख़ुद को पहली बार पा लेने की।

    दुनिया को छोड़ देने की;
    तेरे लिए गीत नहीं… अपनी ख़ामोशी तक गुनगुनाने की;
    तेरे लिए कुछ नहीं… सब कुछ कर जाने की।

    और फिर… उस सब के बाद भी,
    एक अधूरी-सी तड़प के साथ —
    फिर एक बार नहीं, हर बार,
    तुझसे प्यार करने की।

  • किसी रोज़ महफ़िल में

    किसी रोज़ महफ़िल में —
    जब माहौल भी होगा, समय भी, और साथ भी —
    तब सुनाएँगे, और बताएँगे, यह कहानी भी।

  • तुम ही हो…

    रात की बेचैनी, सुबह का सुकून हो;
    सर्दी की गर्मी, गर्मी की सर्दी हो।
    पहर-दोपहर, फिर ढलते सूरज का नूर हो;
    ख़याल-ओ-ख़्याली की कशिश हो।
    कुछ पाने की, कुछ खोने की तलब हो;
    हो तो जाने की, न हो तो आने की बेचैनी हो।
    तुम ही हो…

  • दर्द की तर्जीह

    बे-रंग नहीं, मैं आधा ज़िंदा हूँ इन रंगों में,
    एक सुकून भी छुपा है मेरी ही बे-चैनियों में।

    खुद को ढूँढने निकला था तेरी यादों के रास्तों पर,
    पर तुझे खोना भी कब से शामिल है मेरी रज़ाओं में।

    तुझे भूल जाना चाहता हूँ…
    मगर यादें इंसान से ज़्यादा वफ़ादार होती हैं।

    शायद आदत पड़ जाए खामोश रहने की,
    पर कुछ आदतें जान नहीं लेतीं —
    खुद को मार देती हैं।

    आज कुछ टूटा नहीं…
    आज मैं पूरी तरह गिर पड़ा हूँ,
    इतना कि खुद को उठाने का भी मन नहीं।

    ये हार प्यार से नहीं लगी —
    ये वार मेरे अपने होने पर हुआ है।

    कभी सोचता हूँ, किसी पहाड़ पर तू मिल जाए…
    तो क्या मैं पुकारूँगा?
    नहीं।
    शायद बस दूर खड़ा रहूँगा —
    तेरी आवाज़ को हवा में महसूस करते हुए,
    और सोचूँगा…
    शायद जो खोया, वही मेरी किस्मत था।

    किसी ने सच कहा था —
    कुछ नहीं रखा इस प्यार में।
    प्यार में सबसे ज़्यादा दर्द जुदाई का नहीं,
    प्यार के खत्म होने का होता है।

    तन्हाई ने मुझे एक राज़ बताया —
    दिल सिर्फ टूटता नहीं…
    कभी-कभी वो बिना आवाज़ राख भी बन जाता है।

    और लोग पूछते हैं —
    “तू ठीक तो है?”
    काश मैं कह पाता…
    “मैं अब मौजूद नहीं।”

    पर एक सच्चाई और है —
    दर्द मुझे खत्म नहीं करेगा।
    मैं इस दर्द को गले लगाऊँगा,
    क्योंकि यही अब आख़िरी चीज़ है
    जो तुझे मुझसे जोड़ती है।

    तू गया… पर दर्द रह गया।
    और सच कहूँ —
    तेरे जाने से ज़्यादा,
    मुझे इस दर्द से मोहब्बत हो गई है।

  • मैखाने में नादारद

    मैखाने में नादारद, एक दस्तक-सी ज़िन्दगी;
    कभी चंद ख़ुशनुमा लम्हों की मोहताज-सी।
    ग़म के नग़्मों में, अकेले एक साथ बन गई;
    और एक और जाम के इंतज़ार में, ज़िन्दगी बदलती गई…

    सितारों से पूछी मैंने अपनी तन्हाई की कहानी;
    उन्होंने कहा — यह राहगुज़र है वीरानियों की।
    कभी रात के साये में, चाँदनी की आरज़ू-सी;
    कभी सुबह के उजाले में, ख़्वाबों की तलाश-सी…

    राहों में बिछी चुप्पियों की चादर को,
    महसूस किया मैंने हर क़दम पर;
    साँसों में बसी एक अनकही तड़प,
    और दिल में छुपी एक बेक़रार चाहत…

    फिर भी, उम्मीद की किरणों से रोशन यह जीवन;
    हर दर्द में छिपा है एक नया सवेरा,
    हर आँसू के पीछे एक मुस्कान की चाह —
    और हर अँधेरे के बाद, एक नई सुबह की आस।