तुम ही हो…

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रात की बेचैनी, सुबह का सुकून हो;
सर्दी की गर्मी, गर्मी की सर्दी हो।
पहर-दोपहर, फिर ढलते सूरज का नूर हो;
ख़याल-ओ-ख़्याली की कशिश हो।
कुछ पाने की, कुछ खोने की तलब हो;
हो तो जाने की, न हो तो आने की बेचैनी हो।
तुम ही हो…

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