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  • भरे बाज़ार में

    एक रोज़, शाम ढले वो मिली हमें फिर से,
    क़िस्मत भी देखो — मिली भी भरे बाज़ार में।

    नज़र मिली — या शायद मैं ही देखता रह गया।
    मानो सूरज को खुली आँखों से देख लिया हो।
    एक पल को आँख बंद कर ली —
    पर सूरज बंद आँखों में भी जलता रहा।

    मन को टटोला, तो लगा —
    पास जाऊँ? गले लगाऊँ?
    पूछूँ कैसी हो तुम,
    कैसे चल रही है ज़िंदगी,
    कुछ सुनूँ, कुछ सुनाऊँ,
    सिलसिला यूँही चलता रहे,
    उन्हें जताऊँ कि कितनी याद आती है,
    उनका हाल-ए-दिल भी नापूँ,
    उन्हें फिर हँसते देखूँ,
    और फिर एक बार मैं भी हँसूँ,
    और हँसते-हँसते दो आँसू आ जाएँ,
    और वो पूछें, क्या हुआ,
    और मैं उन्हें बताऊँ कि…

    फिर नहीं।

    मन वहीं धर दिया,
    दूर से एक मुस्कान दी —
    भीड़ थी, पता नहीं पहुँची भी या नहीं।
    और चल दिए…
    जैसे उस पहर, उस दिन, उस साल।

    ख़ैर, बहुत दिन हो गए —
    इतने, कि अब याद और गुमान में फ़र्क़ नहीं रहा।

  • बस इशारा रह गया

    बातों से भरा हुआ वो पिटारा रह गया,
    कहने को बहुत कुछ था, बस इशारा रह गया।

    शिकायतों का झोला हल्का हुआ करता था,
    अब जो भरा तो सिर्फ़ ये कंधा बेचारा रह गया।

    वो छोटी सी बात थी, कह देते तो निकल जाती,
    कही नहीं गयी — सीने में शरारा रह गया।

    दरिया तो बह गया, दोनों तरफ़ ख़ाली पड़ी,
    तुम उस तरफ़, मैं इस तरफ़, बस ये किनारा रह गया।

    सोचा था झोला खोल के रख दूँगा सामने तेरे,
    तुम आये ही नहीं, दिल में गिला सारा रह गया।

    ‘अभय’ अब राह में हर एक से बात हो जाती है,
    वो बात ही नहीं होती, बस एक गुज़ारा रह गया।


    वही बात — खुली नज़्म में

    बातों का पिटारा लिये फिरता था,
    छोटी-मोटी जो भी होती, सब कह देना,
    बात से बात का निकलना, वक़्त का गुज़र जाना,
    अब उनसे बात हुए इतना अरसा… कि गिनना छोड़ दिया।

    शिकायतों का झोला हल्का सा रहता था,
    वक़्त-बेवक़्त, दिल की हर बात कह जाना,
    यूँ ही कुछ भी मान लेना, हक़ से अपना कहना,
    वक़्त के साथ झोला भरता गया… अब उठाया नहीं जाता।

    अब भी छोटी-मोटी होती है, मगर किसको कह देना,
    जेब में रख लेना, और भूल जाना,
    हर बात अधूरी, होंठों तक आ के रुक जाना,
    पिटारा वही का वही… बस अब खुलता नहीं।

    कई बार सोचा, झोला खोल के सामने रख दूँ,
    एक-एक शिकायत गिनवा दूँ, थोड़ा हल्का हो जाना,
    फिर ख़याल आया — अब वो हक़ ही कहाँ रहा,
    शिकायत किस से करना… और माफ़ी किस से माँगना।

    अब दोनों कंधे पे हैं — एक ख़ाली, एक भरा,
    अजीब है कि बोझ दोनों का एक सा,
    रास्ते में जो मिले, उससे हाल कह देना,
    पर वो बात नहीं होती… जो उनसे हुआ करती थी।

  • ज़िंदगी, होड़ और ख़ुद

    1.
    किसी रोज़ अपनी शख्सियत से मसरूफ तो हो,
    ज़िन्दगी से जितने भी इल्म हैं, सब समझ जाएगा।


    2.
    शोर के बीच ये मेरी चुप्पी,
    सुनके मैं खुद ही चौंक जाता हूँ!
    सच तो होता नहीं बर्दाश्त तुम्हें,
    झूठ मैं बोल नहीं पाता हूँ…!


    3.
    चलो फिर चले घर, गुजारे एक दिन और सराय में,
    कुछ दिन और सही, गुजरे ये वक्त भी।


    4.
    कुछ लोग चल रहे हैं…
    कुछ और दौड़ रहे हैं…
    कुछ तो व्यायाम भी…
    एक शख्स अकेले बैठे ये सोच रहा है…
    अब आगे करना क्या है…


    5.
    वक्त-ए-हिसाब में रो पड़े,
    पैसे थे लगा बहुत कमाया जिंदगी भर,
    दरअसल उसके अलावा कुछ और था ही नहीं।


    6.
    दौड़ते-दौड़ते जिंदगी तो संभाल ली तुमने,
    अब ये बताओ तुम्हें कौन संभालेगा?


    7.
    रुसवा हो गए जिंदगी से ये भी देख लिया,
    फायदा तो चुप रहने में ही है।


    8.
    ख्वाब ने पूछ लिया कुछ नया नहीं?
    मैंने सोचा और नहीं बोला,
    सब या तो पूरे हो गए,
    या सब चकनाचूर हो गए।


    9.
    गुलाम हैं सब अपनी परछाई के,
    कहीं इनकी भी अपनी दुनिया तो नहीं?


    10.
    अए जिंदगी, तुझे समझाते-बूझते,
    कुछ इस कदर रूठ गया हूँ अपने आप से,
    अब तो इत्मिनान भी इज्तिरार में ही मिलता है…


    11.
    अब कहीं जाकर लगने लगा था,
    उससे उम्मीद रखना छोड़ दी मैंने,
    एक बार फिर उसने मौका दे दिया,
    कि उम्मीद रखनी इतनी भी बुरी नहीं…


    12.
    सुबह के बहाने तैयार हैं हर जाने के लिए इस जंग से,
    लेकिन एक कारण रोज़ दफ्तर की राह दिखलाता है,
    बन लो जनाब पैसा, इंसान से क्या-क्या करवाता है…


    13.
    डर-डर की, आदत सी हो गई है डर की,
    अब इस डर का कोई डर नहीं…

  • वक़्त, जुदाई और किस्मत

    1.
    ख्वाहिशों में कुछ कसर रही होगी,
    शब्दों के रास्ते यूँ झलकती नहीं।


    2.
    किसी रोज़ जब हम मिले तो,
    लेखा-जोखा होगा पिछले कितने ही सालों का…


    3.
    काश, अक्सर और ख्वाहिशें,
    शायद ऐसे परिंदों के पर काट दिए जाते हैं…


    4.
    ख्याल शायद इतने भी बुरे नहीं होते,
    ना होने पे भी किसी का झूठा एहसास तो करा देते…


    5.
    कैसी ज़िद है किस्मत की,
    बेवजह ही तुम्हारे पास और फिर तुमसे दूर ले जाती है…


    6.
    याद तो आने के लिए है,
    जाने के लिए तो लोग होते हैं।


    7.
    अब अलग हैं तो वक़्त से क्या शिकवा करना उसके लिए।


    8.
    समय तेरे संकेत पर ठहरा, और हम तेरे किनारे पर खड़े रह गए।


    9.
    वक़्त से नाराज़ी कैसे करूँ,
    इज़्ज़त तो हमने उसने की है नहीं।

  • इश्क़, याद और तुम

    1.
    कुछ ख्वाहिशों की तमन्ना जरूर है दिल में,
    लेकिन तेरी खुशी से ऊपर कुछ भी नहीं।


    2.
    तुम संग कुछ यूँ उलझे, खुद को ही भूल गए।


    3.
    तेरी यादों को कुछ इस तरह सँजो के रखा है,
    अपना शहर भी बेगाना हो गया,
    दोस्तों की महफ़िल भी तन्हा हो गई।


    4.
    सोचता हूँ तुमसे शिकायतें करूँ,
    फिर तुम्हें हंसते देख सब भूल जाता हूँ


    5.
    लफ्ज से अक्स तक बस अब
    तुम्हारे प्यार के कैदी हैं।


    6.
    गुस्से में अक्सर वो हमारे गले लग जाती है,
    और भी ज़माने भर के शिकवे यूँ ही भूल जाती है।


    7.
    किसी रोज़ मंदिर में दिया ना जले तो मान लेना,
    तुम्हें आज हमने याद नहीं किया


    8.
    वक्त देखा तो एक पहर बीत गया था,
    लेकिन तुम्हारी याद अभी ताज़ा थी।
    सोचा कुछ करें और बाहर चलें,
    निकले ही थे, तुम वहाँ भी मिल गई।


    9.
    तुमने तो कह दिया कि मुझे भूल जाओ,
    घर दोस्त जो भुला दिए तुम्हारे लिए वो?


    10.
    किसी रोज़ आऊंगा तो एक तोहफा लाऊंगा,
    आज भी दिल में छुपा के रखा है तुम्हारी हंसी को।


    11.
    तुम्हें सोचता हूँ हर रोज़,
    लेकिन अब और नहीं…


    12.
    अरसो पुरानी एक आरज़ू,
    गुफ्तगू हो और जुस्तजू भी।


    13.
    अब तुम्हारे होने की ऐसी आदत हो गई है, तुम नहीं होती तो अधूरी सी हो जाती है जिंदगी।


    14.
    तुम याद करोगी तो बहुत कुछ बोलूंगा,
    खैर छोड़ो कल की बातें,
    अब तुम्हें बस ये इतला कर दूं,
    अब फिर से तुमसे उम्मीद करने लगे हैं…


    15.
    दिल ने जब-जब इस दुनिया को टटोला,
    कुछ उलझे रिश्ते और कुछ रूठे हुए प्यार ही पाए…

  • उगते सूरज से ढलते सूरज तक

    पहले पहर में उगते सूरज से तुम ज़िन्दगी में रोशनी लाई, फिर दूसरे पहर में ढलते सूरज सी डूब कर चली भी गई। अब इस लंबी रात में, चाँद के सहारे तुम्हारे इंतजार में ये जीवन बीत रहा है, डर तो इस बात का है, कि अगली सुबह कहीं ग्रहण न हो जाए।

    खैर, वह आँखें और तिल, मेरे नाम पर मुस्कुराते तुम्हारे होंठ, जुल्फों से खेलते हुए उन्हें बांधना तुम्हारा, रूठ के गुस्से में नाक फूलाना, अपने हाथों से मेरे कान पकड़ना। मेरे कंधे पर सिर रखकर तेरा सोना, और मेरा हाथ पकड़ना,

    इन्हें भूल गई हो तुम, जो कि काफी हैं फिलहाल मेरे जीने के लिए।

  • सुनहरी नौका

    अनोखे एक अद्वितीय सफर में, सुनहरी नौका पर सवार,
    शख्स बहुत निकले, फिर मजबूरी में आज।
    ठहर जाने किसी किनारे, मंज़िल की राह,
    ध्यान से देखा तो सोचते अब एक बात।
    भीड़ में ऐसे कितने हैं लोग, साथ मेरे,
    कुछ के चेहरे, कुछ की आंखें,
    कुछ और बोले भी तो क्या,
    एक ही सवाल सभी सोचते, क्यों?
    शाम होते सोचा भीड़ बन जाए आज,
    हिम्मत ने याद दिलाया, घर और ज़रूरतें भी हैं तेरे पास।
    हिम्मत वही पिघल गई, डूबते सूरज जैसी,
    फिर से निकल गए ख्वाबों के पुल बनाते।
    ज़िंदगी के किनारे पर सुनहरी नौका पर सवार।

  • मेरी ही ज़िद

    एक रोज़ उठा तो एक शख्स मेरे पास खड़ा था…
    अलग सी कद-काठी और चेहरा उसका,
    आंखें थीं लेकिन होंठ नहीं,
    बाल थे लेकिन भौंहें नहीं,
    मैं चौंका और पूछा, “कौन हो भाई?”
    धृष्ट वो आदमी वैसे का वैसा खड़ा रहा,
    गुस्सा आया और मैंने पकड़ा,
    फिर भी वह हिला नहीं वहां से।
    मैंने और जोर से कोशिश की,
    जितना उसके पास जाऊं उतना वह मुझपे हावी हो जाए।
    कुछ समझ नहीं पाया,
    तो हार कर पत्नी को जगाया,
    “देखो ये कौन है?”
    पत्नी ने नींद से उठकर बड़बड़ाई,
    “पागल हो गए हो, कोई नहीं है यहां।”
    यह कहकर वह फिर सो गई।
    मैं विचलित मन से उस शख्स को देखता रहा,
    सोचा कि क्या आफत गले पड़ गई,
    धर्म संकट में था तो संकट मोचन को भी याद कर लिया।
    कुछ समझ नहीं आया और शख्स मुझे देखे जाए,
    मेरा पारा चढ़ने लगा,
    और मैंने उसे एक मुक्का मार दिया,
    हुआ कुछ नहीं, मुझे ही दर्द हुआ।
    कराहते हुए बैठ गया और सोचा, “हैं क्या ये बला?”
    मानो जैसे जिद सी सवार हो गई हो मन में,
    बहुत सोचा और समझ आया,
    ये और कोई नहीं, मेरी ही जिद है जिंदगी की।

  • होड़

    होड़ लगी है नंबर लाने की,
    होड़ लगी है डिग्री पाने की,
    होड़ लगी है प्यार करने की,
    होड़ लगी है पैसा कमाने की,
    होड़ लगी है भव्य मकान बनाने की,
    होड़ लगी है बच्चों को सुंदर दिखाने की,
    होड़ लगी है बड़ा मंदिर मस्जिद बनाने की,
    होड़ लगी है दूसरों को छोटा दिखाने की,
    होड़ लगी है इसी होड़ में खो जाने की।

  • इश्क़ की किताब

    इश्क में न चाहते हुए भी जिंदगी की किताब में हजारों पन्ने शायरी के जुड़ जाते हैं,
    और उसकी इश्क में उसकी किताब में कुछ पन्ने इश्क में लहूलुहान भी हो जाते हैं,
    फिर जब वो पन्ने हकीकत में सहने होते, तो समझ नहीं आता…
    कि दिल शायर हो गया है, या दिल में दर्द इतना है…
    जनाब ये इश्क चीज ही ऐसी है।