मैखाने में नादारद, एक दस्तक-सी ज़िन्दगी;
कभी चंद ख़ुशनुमा लम्हों की मोहताज-सी।
ग़म के नग़्मों में, अकेले एक साथ बन गई;
और एक और जाम के इंतज़ार में, ज़िन्दगी बदलती गई…
सितारों से पूछी मैंने अपनी तन्हाई की कहानी;
उन्होंने कहा — यह राहगुज़र है वीरानियों की।
कभी रात के साये में, चाँदनी की आरज़ू-सी;
कभी सुबह के उजाले में, ख़्वाबों की तलाश-सी…
राहों में बिछी चुप्पियों की चादर को,
महसूस किया मैंने हर क़दम पर;
साँसों में बसी एक अनकही तड़प,
और दिल में छुपी एक बेक़रार चाहत…
फिर भी, उम्मीद की किरणों से रोशन यह जीवन;
हर दर्द में छिपा है एक नया सवेरा,
हर आँसू के पीछे एक मुस्कान की चाह —
और हर अँधेरे के बाद, एक नई सुबह की आस।
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