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  • ज़िन्दगी का खेल

    ज़िन्दगी भी मस्त खेलती है —
    मैं चलना सीखता हूँ, ये भागने लगती है;
    मैं भागना सीखता हूँ, ये रुक जाती है;
    मैं रुकना सीखता हूँ, ये बदल जाती है;
    मैं बदलना सीखता हूँ, ये समझ नहीं आती;
    मैं समझना सीखता हूँ, ये उलझ जाती है;
    मैं सुलझाना सीखता हूँ — ये फिर चलने लगती है।
    मैं फिर चलना सीखता हूँ…

  • जाने क्या बात है

    जाने क्या बात है, आज गुनगुना-सा मिज़ाज है;
    बता पाना तो चाहता हूँ, पर न जाने क्या बात है, जो रोके जा रही है फिर भी।

    कुछ तो है इस वक़्त के दरमियाँ —
    मेरी एक छोटी-सी और कहानी, लफ़्ज़ दो लफ़्ज़ की एक और जवानी।

    जाने क्या बात है, विरत-सा मन आज है;
    चंद लम्हे ही तो थे, न जाने मन क्यों उदास है।

    रुख़ से, रुक-रुक के आते तो हैं,
    पर ज़ुबान समझ नहीं पाती, क्या बात है।

    एक और किस्सा-सा लगने लगी है अब मुझे मेरी ज़िन्दगी;
    जाने क्या बात है — याद भी है, साथ भी;
    न कोई रूठा है, न जुदा;
    बस, वक़्त के साथ दिल से एक ख़ुशी नहीं,
    और आस-पास सब बेकार-सा है — न जाने ऐसी क्या बात है…

  • बेरुख़ी

    यूँ न बेरुख़ी करो हमारे प्यार से,
    जान चली जाती तुम्हारे एक इशारे से।
    ज़रा नज़र उठा के तो देखो —
    आसमान भी रो रहा तुम्हारे प्यार के लिए।

    एक अरसे से उनको देखा नहीं,
    तिनके-तिनके में आती है नज़र;
    यूँ ही हँसते हैं उनकी याद में,
    ज़माना कहता — एक और दीवाना उसके प्यार में।

    तुमसे मिलने को मन करता है,
    लेकिन दिल को क्या पता, तुम तो बेवफ़ा हो…

    यक़ीन न हो तो पूछ लो दिल से —
    “हम आपके हैं कौन?”

    ज़माने भर से दोस्ती कर ली,
    सोचा — तुम कभी तो किसी के साथ मिल जाओगी।

    तुम्हारी याद में गुज़र गए लम्हे हज़ारों;
    किसी हँसीं लम्हे से जुदा-सा लगता है तुम्हारा सपना।
    पास भी हो, दूर भी, इस दिल से — तुम और तुम्हारी यादें;
    पर फिर भी, इस दिल को इनकार नहीं तुम्हारी नफ़रत से…

  • तुम और तुम्हारी सी

    मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र — एक ज़िद, एक जुनून-सी चलती;
    नशे से गहरी एक सोच की तरह, वक़्त की चोट से पुरानी एक याद-सी।

    सुबह की चादर में सोती, धीरे-धीरे गिरती बूँदें ओस की;
    रात की शबनम, और दिन में बुनती — जगमगाती, झिलमिल रंगों में बनती-बुझती।

    ठंड में ठिठुरती और सोती, एक साये में आती, खो जाती-सी;
    एक आस दिल में चुभती हुई-सी — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी…

    शब्दों में डूबती, सन्नाटे में छुपती-सी;
    शाम की दलदल-सी, उम्मीद के दामन में लिपटी।

    चाय के प्याले में खुलती, मीठी-सी एक सपने में खोती;
    एक तनहा रात-सी, आँखों में झूलती एक उम्मीद-सी।

    ज़िन्दगी से लड़ती-झगड़ती, यह वो एक दिन-सी;
    छुप-छुप के हँसती — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी…

    सफ़र से लंबी प्यार की, आँखों से छोटी बात की;
    गहरी साँसों में छुपती, लम्हों में भीगी यादों-सी।

    इधर-उधर चलती एक कहानी के पलटते पन्नों-सी;
    हँसी के चेहरे से हसीन — दुआ और दावा-सी।

    मैं और तुम में बुनती, एक याद तुम्हारी-सी;
    भीगी-भीगी पलकों से — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी… मेरी ज़िन्दगी।

  • रंगमंच

    ज़िन्दगी है एक रंगमंच,
    जिसने जो बोला, वो सच का साया;
    जिसने जो देखा, वही उसने सोचा।
    कुछ वक़्त का नाटक,
    और फिर सब कुछ ग़ायब।

    यहाँ है हर रोज़ एक तमाशा,
    लेकिन सच को भला किसने समझा?
    क्योंकि ज़िन्दगी तो है, बस, रंगमंच का एक साया…

  • दौड़

    यह दौड़ है कैसी,
    जिसमें रोज़ है हार-जीत;
    रोज़ कोई डरता है इस दौड़ से,
    और फिर अपने ही कल में खो जाता है।

    बेबसी से चलता आज का कल,
    और पल-पल खोता अपना जीवन;
    समझ से सब दूर जैसे —
    लेकिन अक्सर, यह सोच, दिल रोता है…

  • यह ज़िन्दगी

    कभी लगे ज़िन्दगी दरिया-सी छोटी, तो कभी सागर-सी गहरी;
    एक रोज़ रात के सन्नाटे को जीती, और किसी रोज़ चाँदनी में जगमगाती।
    एक कल से भागते हुए, एक कल को बुनते हुए — जीते हैं हम यह ज़िन्दगी;
    न जाने किस ओर जाती हुई, लड़खड़ाती और चलती हुई — यह ज़िन्दगी।

  • ज़िन्दगी की यह छाया

    ज़िन्दगी की कुछ शामें जगमगातीं,
    और कुछ सुबहें लड़खड़ातीं;
    इस ज़िन्दगी के कुछ साथी,
    और कुछ की बस याद, कुछ साथ ही।

    कहीं दूर बैठे सोचते, और हम हँसते;
    कभी रोती, तो कभी हमें मनाती;
    फिर कुछ वक़्त हँसती रहती —
    एक छोटी-सी ज़िन्दगी।

    कभी कुछ खोते, कभी कुछ पाते,
    समझ से कहीं दूर है यह ज़िन्दगी;
    जब कभी कोशिश करते,
    इतने में चल पड़ती है ज़िन्दगी की यह सवारी।

    कभी पतझड़-सी काया,
    और कभी सुन्दर-सी काया…

  • मेरी एक दोस्त

    मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र खिलखिलाती — वो हस्ती,
    महकती, बहकती, किसी को बहलाती, दीवाना बनाती — वो हस्ती।

    एक पल के लिए थाम लेती वो सबके सपनों की डोर,
    फिर छोड़, बच्चों-सी नादान बनकर कहती — “हूँ ही मैं इतनी अच्छी।”

    अक्सर आँखों से कुछ बोलती, ज़ुबान से कुछ और —
    यूँ तो हँसती थी वो हर वक़्त, लेकिन रोती भी थी कभी-कभी।

    फिर भी, हँसती-खिलखिलाती, ज़िन्दगी से खुश — चलती रहती, वो मेरी एक दोस्त…

  • ज़िन्दगी

    है छोटी-सी उड़ान, यह चलती-फिरती ज़िन्दगी,
    सागर से गहरी, आसमान से ऊँची — कुछ लफ़्ज़ों की ज़िन्दगी।
    किसी की चाहत की, किसी की मुस्कुराहट की हस्ती — यह ज़िन्दगी,
    रंग बदलती, सुरों में सजती, नन्ही-सी ज़िन्दगी।