दिल-ए-मजबूरी

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तेरी आरज़ू की कैसी ये ख़लिश है —
तुझसे मिलकर भी जुदा हूँ,
तुझसे दूर रहकर भी ख़फ़ा हूँ।

वक़्त-ए-तकलीफ़ के तराज़ू में
तौलूँ भी कैसे ये जुस्तजू?
तकलीफ़ तो क़िस्मत की है —
दिल की क्या ग़लती?

पर दिल-ए-मजबूरी तो तुम ही हो…
और तुम ही रहोगे।

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