जाने क्या बात है, आज गुनगुना-सा मिज़ाज है;
बता पाना तो चाहता हूँ, पर न जाने क्या बात है, जो रोके जा रही है फिर भी।
कुछ तो है इस वक़्त के दरमियाँ —
मेरी एक छोटी-सी और कहानी, लफ़्ज़ दो लफ़्ज़ की एक और जवानी।
जाने क्या बात है, विरत-सा मन आज है;
चंद लम्हे ही तो थे, न जाने मन क्यों उदास है।
रुख़ से, रुक-रुक के आते तो हैं,
पर ज़ुबान समझ नहीं पाती, क्या बात है।
एक और किस्सा-सा लगने लगी है अब मुझे मेरी ज़िन्दगी;
जाने क्या बात है — याद भी है, साथ भी;
न कोई रूठा है, न जुदा;
बस, वक़्त के साथ दिल से एक ख़ुशी नहीं,
और आस-पास सब बेकार-सा है — न जाने ऐसी क्या बात है…
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