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  • भीड़ कुछ ज़्यादा है

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है!
    मैं खो न जाऊँ इसमें कहीं!
    जब हम भी अनसुना करते थे —
    आज हम भी हुए, तो ऐसा क्या है!
    ना जाने इस बार क्या ख़ास बात है…

    अकेले-से दिख रहे हैं चेहरे कई,
    कुछ कह रहे हैं, लेकिन कई कुछ नहीं;
    लगता है, भीड़ की तन्हाई ही ऐसी है।

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
    सोचता हूँ, मैं भी भीड़ ही बन जाऊँ —
    अपने जाने-पहचाने कुछ चेहरे थे,
    बेगानी-सी भीड़ में छुपे हैं, वो भी।

    ना जाने इसमें क्या बात है —
    भीड़ में खोए हम, तब भी कुछ याद है;
    भूले नहीं जिसे हम कभी भी,
    वही हमारी तन्हाई की याद है।

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
    हैं इस इंतज़ार में हम भी, मगर —
    शायद कोई पुकारे भीड़ से हमें,
    तोड़े ये पल-पल मारता अँधेरा।

  • न किया होता

    तन्हाई के पल से जब मिले हम,
    दिल में न जाने कहाँ एक टीस हुई।
    सोचा — प्यार की रचना किसने की?
    उस दिन तुम्हारे प्यार की याद आई।

    सोचा — किसने, कैसे, और क्यों बनाया?
    कभी ख़ुशी की बारिश होती है,
    कभी अपने ही लहू के आँसू की।
    लेकिन एक बात मेरी समझ ज़रूर आई:

    न किया होता प्यार हमने तुमसे,
    शायद ऐसे कथन तो न होते;
    यूँ रात को तन्हाई में जागे न होते,
    तुम्हारी याद में यूँ तो न रोते।

    न जाने कितने और ऐसे होंगे,
    कितने ही मेरे जैसे अकेले होंगे।
    मुझे नहीं पता, क्या होगा मेरा,
    जीवन के किस मोड़ पर जाऊँगा।

    पर यह नज़ाकत समझ तो आ गई —
    इश्क़ से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती।
    काश हमने भी इश्क़ न किया होता,
    तन्हाई का दर्द हमें भी न होता,
    वक़्त की चोट से यूँ रूबरू न होते,
    न ही कोई हमें रुलाने वाला होता।

  • ज़िन्दगी को

    उस रात के अँधेरे से निकली एक आवाज़,
    न जाने कौन था वो — एक अजनबी इंसान।
    डरा-सहमा-सा मुझे था पुकार रहा,
    रो-रो के, सहमा-सा मुझे निहार रहा।

    वो डरी-डरी-सी आवाज़ गूँजती रही,
    कुछ न होते हुए भी, डराती रही।
    हर पल सोचने पर मजबूर करती —
    क्या मेरा ही था वो प्रतिबिंब?

    लेकिन क्यों थी उसकी ऐसी हालत,
    आख़िर क्या था उसका कसूर?
    सोचते-सोचते दिन महीनों में बदल गए,
    उससे गुज़रते रहे हर रोज़, और हम रोते रहे।

    आज समझ आया, कि वो था कौन —
    मेरा ही हृदय था, मुझे पुकार रहा।
    “जाग जा, अभी देर नहीं हुई” —
    बस यही वो कहे जा रहा।

    “अभी तो तूने कुछ किया ही नहीं,
    फिर क्यों रहता है इतना परेशान?
    सँभाल ख़ुद को, जी ले यह जीवन —
    अभी बहुत कुछ बाक़ी है इस जीवन में।

    हर पल मिलकर बनता है यह जीवन,
    जी ले इस प्यारे-से उपहार को।
    किस्मत अच्छी है तेरी, जो मिला है जीवन —
    ज़िन्दगी के हर पल को कर दे प्यार के नाम।”

  • मै पंछी विशाल नील गगन का

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    मुझे आज इसमें समा जाने दो।
    आज मन-सागर के भावों को फूट-फूट कर,
    किरण की भाँति इस गगन में बह जाने दो।

    दूर कहीं है कोई मुझे पुकार रहा —
    ऐसा सोचते हुए मुझे उड़ जाने दो।
    आज खोल दो इस पिंजरे का ताला,
    विशाल नील गगन की सैर पर जाने दो।

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    ज्ञान-अज्ञान की परिभाषा से परे।
    मालूम है तो सिर्फ़ एक प्रेम की भाषा —
    आज मुझे फिर हवाओं पर सवार हो जाने दो।

    नफ़रत की भाषा का यह कैसा स्वरूप?
    मुझे न तुम लोग इसमें घसीट डालो।
    सोचने को हैं और भी बहुत-सी बातें, लेकिन
    मुझे आज इस आसमान में खो जाने दो।

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    मुझे आज सिर्फ़ उड़ जाने दो।
    असीमित है मेरे मन का बल —
    मरने से पहले एक बार जी जाने दो।