ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है!
मैं खो न जाऊँ इसमें कहीं!
जब हम भी अनसुना करते थे —
आज हम भी हुए, तो ऐसा क्या है!
ना जाने इस बार क्या ख़ास बात है…
अकेले-से दिख रहे हैं चेहरे कई,
कुछ कह रहे हैं, लेकिन कई कुछ नहीं;
लगता है, भीड़ की तन्हाई ही ऐसी है।
ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
सोचता हूँ, मैं भी भीड़ ही बन जाऊँ —
अपने जाने-पहचाने कुछ चेहरे थे,
बेगानी-सी भीड़ में छुपे हैं, वो भी।
ना जाने इसमें क्या बात है —
भीड़ में खोए हम, तब भी कुछ याद है;
भूले नहीं जिसे हम कभी भी,
वही हमारी तन्हाई की याद है।
ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
हैं इस इंतज़ार में हम भी, मगर —
शायद कोई पुकारे भीड़ से हमें,
तोड़े ये पल-पल मारता अँधेरा।