ज़िन्दगी की यह छाया

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ज़िन्दगी की कुछ शामें जगमगातीं,
और कुछ सुबहें लड़खड़ातीं;
इस ज़िन्दगी के कुछ साथी,
और कुछ की बस याद, कुछ साथ ही।

कहीं दूर बैठे सोचते, और हम हँसते;
कभी रोती, तो कभी हमें मनाती;
फिर कुछ वक़्त हँसती रहती —
एक छोटी-सी ज़िन्दगी।

कभी कुछ खोते, कभी कुछ पाते,
समझ से कहीं दूर है यह ज़िन्दगी;
जब कभी कोशिश करते,
इतने में चल पड़ती है ज़िन्दगी की यह सवारी।

कभी पतझड़-सी काया,
और कभी सुन्दर-सी काया…

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