वो एक मुस्कुराहट

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जब कभी मैं ख़ामोश होता हूँ,
किसी दुख के अँधेरे में खो-सा जाता हूँ —
मुझे एक आवाज़, एक हँसी सुनाई देती है:
वो एक तुम्हारी मुस्कुराहट…

लगता है, एक आदत-सी हो गई है
मुझे सपनों में गुम हो जाने की —
इसलिए, कि मुझे मिली थी वो ख़ुशी,
शायद वो तुम्हारी एक मुस्कुराहट की…

कभी-कभी चेहरों में ढूँढता रहता हूँ,
मिल जाए मुझे फिर वैसी कोई हँसी —
मगर नहीं, कोई मिली अभी तक:
वो एक मुस्कुराहट — जानी-अनजानी — मेरी एक दोस्त की…

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