तुम और तुम्हारी सी

Written by

in

मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र — एक ज़िद, एक जुनून-सी चलती;
नशे से गहरी एक सोच की तरह, वक़्त की चोट से पुरानी एक याद-सी।

सुबह की चादर में सोती, धीरे-धीरे गिरती बूँदें ओस की;
रात की शबनम, और दिन में बुनती — जगमगाती, झिलमिल रंगों में बनती-बुझती।

ठंड में ठिठुरती और सोती, एक साये में आती, खो जाती-सी;
एक आस दिल में चुभती हुई-सी — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

बस तुम, और तुम्हारी-सी…

शब्दों में डूबती, सन्नाटे में छुपती-सी;
शाम की दलदल-सी, उम्मीद के दामन में लिपटी।

चाय के प्याले में खुलती, मीठी-सी एक सपने में खोती;
एक तनहा रात-सी, आँखों में झूलती एक उम्मीद-सी।

ज़िन्दगी से लड़ती-झगड़ती, यह वो एक दिन-सी;
छुप-छुप के हँसती — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

बस तुम, और तुम्हारी-सी…

सफ़र से लंबी प्यार की, आँखों से छोटी बात की;
गहरी साँसों में छुपती, लम्हों में भीगी यादों-सी।

इधर-उधर चलती एक कहानी के पलटते पन्नों-सी;
हँसी के चेहरे से हसीन — दुआ और दावा-सी।

मैं और तुम में बुनती, एक याद तुम्हारी-सी;
भीगी-भीगी पलकों से — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

बस तुम, और तुम्हारी-सी… मेरी ज़िन्दगी।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *