मेरी एक दोस्त

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मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र खिलखिलाती — वो हस्ती,
महकती, बहकती, किसी को बहलाती, दीवाना बनाती — वो हस्ती।

एक पल के लिए थाम लेती वो सबके सपनों की डोर,
फिर छोड़, बच्चों-सी नादान बनकर कहती — “हूँ ही मैं इतनी अच्छी।”

अक्सर आँखों से कुछ बोलती, ज़ुबान से कुछ और —
यूँ तो हँसती थी वो हर वक़्त, लेकिन रोती भी थी कभी-कभी।

फिर भी, हँसती-खिलखिलाती, ज़िन्दगी से खुश — चलती रहती, वो मेरी एक दोस्त…

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