यह ज़िन्दगी

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कभी लगे ज़िन्दगी दरिया-सी छोटी, तो कभी सागर-सी गहरी;
एक रोज़ रात के सन्नाटे को जीती, और किसी रोज़ चाँदनी में जगमगाती।
एक कल से भागते हुए, एक कल को बुनते हुए — जीते हैं हम यह ज़िन्दगी;
न जाने किस ओर जाती हुई, लड़खड़ाती और चलती हुई — यह ज़िन्दगी।

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