अनोखे एक अद्वितीय सफर में, सुनहरी नौका पर सवार,
शख्स बहुत निकले, फिर मजबूरी में आज।
ठहर जाने किसी किनारे, मंज़िल की राह,
ध्यान से देखा तो सोचते अब एक बात।
भीड़ में ऐसे कितने हैं लोग, साथ मेरे,
कुछ के चेहरे, कुछ की आंखें,
कुछ और बोले भी तो क्या,
एक ही सवाल सभी सोचते, क्यों?
शाम होते सोचा भीड़ बन जाए आज,
हिम्मत ने याद दिलाया, घर और ज़रूरतें भी हैं तेरे पास।
हिम्मत वही पिघल गई, डूबते सूरज जैसी,
फिर से निकल गए ख्वाबों के पुल बनाते।
ज़िंदगी के किनारे पर सुनहरी नौका पर सवार।
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