Category: Shayari

Shayari and short verses — couplets and ghazal-style lines, mostly in Hindi — on love, separation, and the ache of living.

  • दौड़

    यह दौड़ है कैसी,
    जिसमें रोज़ है हार-जीत;
    रोज़ कोई डरता है इस दौड़ से,
    और फिर अपने ही कल में खो जाता है।

    बेबसी से चलता आज का कल,
    और पल-पल खोता अपना जीवन;
    समझ से सब दूर जैसे —
    लेकिन अक्सर, यह सोच, दिल रोता है…

  • यह ज़िन्दगी

    कभी लगे ज़िन्दगी दरिया-सी छोटी, तो कभी सागर-सी गहरी;
    एक रोज़ रात के सन्नाटे को जीती, और किसी रोज़ चाँदनी में जगमगाती।
    एक कल से भागते हुए, एक कल को बुनते हुए — जीते हैं हम यह ज़िन्दगी;
    न जाने किस ओर जाती हुई, लड़खड़ाती और चलती हुई — यह ज़िन्दगी।

  • ज़िन्दगी की यह छाया

    ज़िन्दगी की कुछ शामें जगमगातीं,
    और कुछ सुबहें लड़खड़ातीं;
    इस ज़िन्दगी के कुछ साथी,
    और कुछ की बस याद, कुछ साथ ही।

    कहीं दूर बैठे सोचते, और हम हँसते;
    कभी रोती, तो कभी हमें मनाती;
    फिर कुछ वक़्त हँसती रहती —
    एक छोटी-सी ज़िन्दगी।

    कभी कुछ खोते, कभी कुछ पाते,
    समझ से कहीं दूर है यह ज़िन्दगी;
    जब कभी कोशिश करते,
    इतने में चल पड़ती है ज़िन्दगी की यह सवारी।

    कभी पतझड़-सी काया,
    और कभी सुन्दर-सी काया…

  • मेरी एक दोस्त

    मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र खिलखिलाती — वो हस्ती,
    महकती, बहकती, किसी को बहलाती, दीवाना बनाती — वो हस्ती।

    एक पल के लिए थाम लेती वो सबके सपनों की डोर,
    फिर छोड़, बच्चों-सी नादान बनकर कहती — “हूँ ही मैं इतनी अच्छी।”

    अक्सर आँखों से कुछ बोलती, ज़ुबान से कुछ और —
    यूँ तो हँसती थी वो हर वक़्त, लेकिन रोती भी थी कभी-कभी।

    फिर भी, हँसती-खिलखिलाती, ज़िन्दगी से खुश — चलती रहती, वो मेरी एक दोस्त…

  • ज़िन्दगी

    है छोटी-सी उड़ान, यह चलती-फिरती ज़िन्दगी,
    सागर से गहरी, आसमान से ऊँची — कुछ लफ़्ज़ों की ज़िन्दगी।
    किसी की चाहत की, किसी की मुस्कुराहट की हस्ती — यह ज़िन्दगी,
    रंग बदलती, सुरों में सजती, नन्ही-सी ज़िन्दगी।

  • ख़ामोश नज़र

    जब वो ख़ामोश नज़र से मुझे देखती है,
    कुछ कहते-कहते न जाने कहाँ खो जाती है।

    जब मैं उससे नज़रें मिलाकर कहता हूँ —
    “कुछ तो बात है जो आप बताना चाहती हैं,”

    झुकी हुई पलकों से वो मुँह मोड़ लेती है,
    फिर धीरे से, एक झूठ ही सही, बोल देती है।

    कुछ कहना होता तो कह देती,
    पर न जाने क्यों, यह बात मुझे बेमानी लगती है।

  • वो एक मुस्कुराहट

    जब कभी मैं ख़ामोश होता हूँ,
    किसी दुख के अँधेरे में खो-सा जाता हूँ —
    मुझे एक आवाज़, एक हँसी सुनाई देती है:
    वो एक तुम्हारी मुस्कुराहट…

    लगता है, एक आदत-सी हो गई है
    मुझे सपनों में गुम हो जाने की —
    इसलिए, कि मुझे मिली थी वो ख़ुशी,
    शायद वो तुम्हारी एक मुस्कुराहट की…

    कभी-कभी चेहरों में ढूँढता रहता हूँ,
    मिल जाए मुझे फिर वैसी कोई हँसी —
    मगर नहीं, कोई मिली अभी तक:
    वो एक मुस्कुराहट — जानी-अनजानी — मेरी एक दोस्त की…

  • भीड़ कुछ ज़्यादा है

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है!
    मैं खो न जाऊँ इसमें कहीं!
    जब हम भी अनसुना करते थे —
    आज हम भी हुए, तो ऐसा क्या है!
    ना जाने इस बार क्या ख़ास बात है…

    अकेले-से दिख रहे हैं चेहरे कई,
    कुछ कह रहे हैं, लेकिन कई कुछ नहीं;
    लगता है, भीड़ की तन्हाई ही ऐसी है।

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
    सोचता हूँ, मैं भी भीड़ ही बन जाऊँ —
    अपने जाने-पहचाने कुछ चेहरे थे,
    बेगानी-सी भीड़ में छुपे हैं, वो भी।

    ना जाने इसमें क्या बात है —
    भीड़ में खोए हम, तब भी कुछ याद है;
    भूले नहीं जिसे हम कभी भी,
    वही हमारी तन्हाई की याद है।

    ना जाने क्यों भीड़ कुछ ज़्यादा है;
    हैं इस इंतज़ार में हम भी, मगर —
    शायद कोई पुकारे भीड़ से हमें,
    तोड़े ये पल-पल मारता अँधेरा।

  • न किया होता

    तन्हाई के पल से जब मिले हम,
    दिल में न जाने कहाँ एक टीस हुई।
    सोचा — प्यार की रचना किसने की?
    उस दिन तुम्हारे प्यार की याद आई।

    सोचा — किसने, कैसे, और क्यों बनाया?
    कभी ख़ुशी की बारिश होती है,
    कभी अपने ही लहू के आँसू की।
    लेकिन एक बात मेरी समझ ज़रूर आई:

    न किया होता प्यार हमने तुमसे,
    शायद ऐसे कथन तो न होते;
    यूँ रात को तन्हाई में जागे न होते,
    तुम्हारी याद में यूँ तो न रोते।

    न जाने कितने और ऐसे होंगे,
    कितने ही मेरे जैसे अकेले होंगे।
    मुझे नहीं पता, क्या होगा मेरा,
    जीवन के किस मोड़ पर जाऊँगा।

    पर यह नज़ाकत समझ तो आ गई —
    इश्क़ से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती।
    काश हमने भी इश्क़ न किया होता,
    तन्हाई का दर्द हमें भी न होता,
    वक़्त की चोट से यूँ रूबरू न होते,
    न ही कोई हमें रुलाने वाला होता।

  • ज़िन्दगी को

    उस रात के अँधेरे से निकली एक आवाज़,
    न जाने कौन था वो — एक अजनबी इंसान।
    डरा-सहमा-सा मुझे था पुकार रहा,
    रो-रो के, सहमा-सा मुझे निहार रहा।

    वो डरी-डरी-सी आवाज़ गूँजती रही,
    कुछ न होते हुए भी, डराती रही।
    हर पल सोचने पर मजबूर करती —
    क्या मेरा ही था वो प्रतिबिंब?

    लेकिन क्यों थी उसकी ऐसी हालत,
    आख़िर क्या था उसका कसूर?
    सोचते-सोचते दिन महीनों में बदल गए,
    उससे गुज़रते रहे हर रोज़, और हम रोते रहे।

    आज समझ आया, कि वो था कौन —
    मेरा ही हृदय था, मुझे पुकार रहा।
    “जाग जा, अभी देर नहीं हुई” —
    बस यही वो कहे जा रहा।

    “अभी तो तूने कुछ किया ही नहीं,
    फिर क्यों रहता है इतना परेशान?
    सँभाल ख़ुद को, जी ले यह जीवन —
    अभी बहुत कुछ बाक़ी है इस जीवन में।

    हर पल मिलकर बनता है यह जीवन,
    जी ले इस प्यारे-से उपहार को।
    किस्मत अच्छी है तेरी, जो मिला है जीवन —
    ज़िन्दगी के हर पल को कर दे प्यार के नाम।”