एक ख़्वाहिश

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एक ख़्वाहिश मेरे मन की —
बारिश हो… और तुम।

घबराई-हुई-सी एक साँस,
जो तुम्हारी धड़कनों से टकराकर
अपनी रफ़्तार भूल जाए;
कंधा मेरा हो… और सिर तेरा,
जैसे थककर तुमने दुनिया छोड़ दी हो।

तुम और मैं —
एक भी, दो भी;
भीगते हुए तुम्हारे बाल,
और मेरे हाथ…
जो उन्हें सुलझाते-सुलझाते
तुममें ही उलझ जाएँ।

वक़्त का पता हो भी… और नहीं भी;
हर पल ठहरता हुआ,
हर लम्हा फिसलता हुआ;
जुस्तजू हो दिल की क़रीबी की,
हर कोशिश — तुम्हें जानने की,
और उसी में, अपने दिल को पहचानने की।

दुनिया से कहीं दूर,
तुममें यूँ खो जाने की,
कि लौटने का रास्ता भी याद न रहे।

ख़लिश हो… तेरे पास आने की,
और डर भी — कि ये दूरी कहीं हमेशा की न हो जाए;
डरते हुए तेरा हाथ पकड़ने की,
जैसे छूट गया, तो सब कुछ बिखर जाएगा।

तुझे खो देने की बेचैनी भी,
तुझे पा लेने की बेबसी भी;
तुझे भूल जाने की हर कोशिश,
और हर कोशिश में, तुझे और गहराई से पा लेना।

तेरे लिए ख़ुद को भूल जाने की,
और उस भूल में, ख़ुद को पहली बार पा लेने की।

दुनिया को छोड़ देने की;
तेरे लिए गीत नहीं… अपनी ख़ामोशी तक गुनगुनाने की;
तेरे लिए कुछ नहीं… सब कुछ कर जाने की।

और फिर… उस सब के बाद भी,
एक अधूरी-सी तड़प के साथ —
फिर एक बार नहीं, हर बार,
तुझसे प्यार करने की।

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