मेरी ही ज़िद

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एक रोज़ उठा तो एक शख्स मेरे पास खड़ा था…
अलग सी कद-काठी और चेहरा उसका,
आंखें थीं लेकिन होंठ नहीं,
बाल थे लेकिन भौंहें नहीं,
मैं चौंका और पूछा, “कौन हो भाई?”
धृष्ट वो आदमी वैसे का वैसा खड़ा रहा,
गुस्सा आया और मैंने पकड़ा,
फिर भी वह हिला नहीं वहां से।
मैंने और जोर से कोशिश की,
जितना उसके पास जाऊं उतना वह मुझपे हावी हो जाए।
कुछ समझ नहीं पाया,
तो हार कर पत्नी को जगाया,
“देखो ये कौन है?”
पत्नी ने नींद से उठकर बड़बड़ाई,
“पागल हो गए हो, कोई नहीं है यहां।”
यह कहकर वह फिर सो गई।
मैं विचलित मन से उस शख्स को देखता रहा,
सोचा कि क्या आफत गले पड़ गई,
धर्म संकट में था तो संकट मोचन को भी याद कर लिया।
कुछ समझ नहीं आया और शख्स मुझे देखे जाए,
मेरा पारा चढ़ने लगा,
और मैंने उसे एक मुक्का मार दिया,
हुआ कुछ नहीं, मुझे ही दर्द हुआ।
कराहते हुए बैठ गया और सोचा, “हैं क्या ये बला?”
मानो जैसे जिद सी सवार हो गई हो मन में,
बहुत सोचा और समझ आया,
ये और कोई नहीं, मेरी ही जिद है जिंदगी की।

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