Category: Shayari

Shayari and short verses — couplets and ghazal-style lines, mostly in Hindi — on love, separation, and the ache of living.

  • आजकल की गुफ़्तगू

    यूँ तो हर रोज़ सुबह होती ही है,
    दिन भी गुज़र ही जाता है किसी तरह से।
    पर कुछ तो है — एक ख़लिश-सी,
    जो मन के किसी कोने में चुपचाप छुपी रहती है।

    एक कशमकश है, जो हर रोज़ रूबरू होती है;
    दिल पर छा जाती है — बेबस कर जाती है।

    सोचें तो जीवन में सब कुछ पाया है;
    आजकल के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं लगता।

    एक उम्मीद से भी ना-उम्मीद-सी ख़्वाहिश,
    एक फ़रियाद से भी बड़ी नज़्म कहने चली —
    कुछ पा लेने की, कुछ खो देने की।

    बस यही है, आजकल मेरी गुफ़्तगू…

  • दिल-ए-मजबूरी

    तेरी आरज़ू की कैसी ये ख़लिश है —
    तुझसे मिलकर भी जुदा हूँ,
    तुझसे दूर रहकर भी ख़फ़ा हूँ।

    वक़्त-ए-तकलीफ़ के तराज़ू में
    तौलूँ भी कैसे ये जुस्तजू?
    तकलीफ़ तो क़िस्मत की है —
    दिल की क्या ग़लती?

    पर दिल-ए-मजबूरी तो तुम ही हो…
    और तुम ही रहोगे।

  • जहाँ हम कभी मिलते थे

    खो गया हूँ मैं कहीं इन वादियों में;
    ऐसा बता देना, दो-चार लोग पूछें तो —
    तुम, और तुम्हारे लिए ही बता रहा हूँ:
    मिलूँगा मैं वहीं, जहाँ हम कभी मिलते थे…

  • महफ़िल में तन्हा

    तेरे चेहरे को देख-देख,
    यूँ ही हँसते-हँसाते रहे,
    तुझे पता भी ना था,
    किसी किनारे हम भी बैठे थे।
    तेरे मेरे बीच के दरमियाँ से
    कहे भी तो क्या बेकार में,
    तुम पूछती तो कुछ कहते, लेकिन
    महफ़िल में तन्हा तो हम ही थे…

  • काश बता पाते

    काश बता पाते तुम्हें,
    इतना ही जता पाते,
    चाहते ना चाहते समझाते बुझाते,
    कितनी मोहब्बत करने लगे हैं।
    रोज़ एक नई उम्मीद सी उमड़ती हो,
    थोड़ा प्यार देती तो बगीचा ही बन जाते,
    पहले शब्द नहीं अक्स बतलाते,
    समझ जाती नहीं तो आंखों में दिखाते।
    एक दिन झुकी नजरों को देखोगी,
    सोचा था खुद ही समझ जाओगी,
    आजकल तुम्हें देखती भी नहीं,
    खैर छोड़ो, अब जान लो…
    कितनी मोहब्बत करने लगे हैं तुमसे…

  • ज़िन्दगी का खेल

    ज़िन्दगी भी मस्त खेलती है —
    मैं चलना सीखता हूँ, ये भागने लगती है;
    मैं भागना सीखता हूँ, ये रुक जाती है;
    मैं रुकना सीखता हूँ, ये बदल जाती है;
    मैं बदलना सीखता हूँ, ये समझ नहीं आती;
    मैं समझना सीखता हूँ, ये उलझ जाती है;
    मैं सुलझाना सीखता हूँ — ये फिर चलने लगती है।
    मैं फिर चलना सीखता हूँ…

  • जाने क्या बात है

    जाने क्या बात है, आज गुनगुना-सा मिज़ाज है;
    बता पाना तो चाहता हूँ, पर न जाने क्या बात है, जो रोके जा रही है फिर भी।

    कुछ तो है इस वक़्त के दरमियाँ —
    मेरी एक छोटी-सी और कहानी, लफ़्ज़ दो लफ़्ज़ की एक और जवानी।

    जाने क्या बात है, विरत-सा मन आज है;
    चंद लम्हे ही तो थे, न जाने मन क्यों उदास है।

    रुख़ से, रुक-रुक के आते तो हैं,
    पर ज़ुबान समझ नहीं पाती, क्या बात है।

    एक और किस्सा-सा लगने लगी है अब मुझे मेरी ज़िन्दगी;
    जाने क्या बात है — याद भी है, साथ भी;
    न कोई रूठा है, न जुदा;
    बस, वक़्त के साथ दिल से एक ख़ुशी नहीं,
    और आस-पास सब बेकार-सा है — न जाने ऐसी क्या बात है…

  • बेरुख़ी

    यूँ न बेरुख़ी करो हमारे प्यार से,
    जान चली जाती तुम्हारे एक इशारे से।
    ज़रा नज़र उठा के तो देखो —
    आसमान भी रो रहा तुम्हारे प्यार के लिए।

    एक अरसे से उनको देखा नहीं,
    तिनके-तिनके में आती है नज़र;
    यूँ ही हँसते हैं उनकी याद में,
    ज़माना कहता — एक और दीवाना उसके प्यार में।

    तुमसे मिलने को मन करता है,
    लेकिन दिल को क्या पता, तुम तो बेवफ़ा हो…

    यक़ीन न हो तो पूछ लो दिल से —
    “हम आपके हैं कौन?”

    ज़माने भर से दोस्ती कर ली,
    सोचा — तुम कभी तो किसी के साथ मिल जाओगी।

    तुम्हारी याद में गुज़र गए लम्हे हज़ारों;
    किसी हँसीं लम्हे से जुदा-सा लगता है तुम्हारा सपना।
    पास भी हो, दूर भी, इस दिल से — तुम और तुम्हारी यादें;
    पर फिर भी, इस दिल को इनकार नहीं तुम्हारी नफ़रत से…

  • तुम और तुम्हारी सी

    मंद-मंद हवा-सी बहती, बेफ़िक्र — एक ज़िद, एक जुनून-सी चलती;
    नशे से गहरी एक सोच की तरह, वक़्त की चोट से पुरानी एक याद-सी।

    सुबह की चादर में सोती, धीरे-धीरे गिरती बूँदें ओस की;
    रात की शबनम, और दिन में बुनती — जगमगाती, झिलमिल रंगों में बनती-बुझती।

    ठंड में ठिठुरती और सोती, एक साये में आती, खो जाती-सी;
    एक आस दिल में चुभती हुई-सी — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी…

    शब्दों में डूबती, सन्नाटे में छुपती-सी;
    शाम की दलदल-सी, उम्मीद के दामन में लिपटी।

    चाय के प्याले में खुलती, मीठी-सी एक सपने में खोती;
    एक तनहा रात-सी, आँखों में झूलती एक उम्मीद-सी।

    ज़िन्दगी से लड़ती-झगड़ती, यह वो एक दिन-सी;
    छुप-छुप के हँसती — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी…

    सफ़र से लंबी प्यार की, आँखों से छोटी बात की;
    गहरी साँसों में छुपती, लम्हों में भीगी यादों-सी।

    इधर-उधर चलती एक कहानी के पलटते पन्नों-सी;
    हँसी के चेहरे से हसीन — दुआ और दावा-सी।

    मैं और तुम में बुनती, एक याद तुम्हारी-सी;
    भीगी-भीगी पलकों से — तुम्हारी याद में चलती ज़िन्दगी।

    बस तुम, और तुम्हारी-सी… मेरी ज़िन्दगी।

  • रंगमंच

    ज़िन्दगी है एक रंगमंच,
    जिसने जो बोला, वो सच का साया;
    जिसने जो देखा, वही उसने सोचा।
    कुछ वक़्त का नाटक,
    और फिर सब कुछ ग़ायब।

    यहाँ है हर रोज़ एक तमाशा,
    लेकिन सच को भला किसने समझा?
    क्योंकि ज़िन्दगी तो है, बस, रंगमंच का एक साया…