वक़्त, जुदाई और किस्मत

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1.
ख्वाहिशों में कुछ कसर रही होगी,
शब्दों के रास्ते यूँ झलकती नहीं।


2.
किसी रोज़ जब हम मिले तो,
लेखा-जोखा होगा पिछले कितने ही सालों का…


3.
काश, अक्सर और ख्वाहिशें,
शायद ऐसे परिंदों के पर काट दिए जाते हैं…


4.
ख्याल शायद इतने भी बुरे नहीं होते,
ना होने पे भी किसी का झूठा एहसास तो करा देते…


5.
कैसी ज़िद है किस्मत की,
बेवजह ही तुम्हारे पास और फिर तुमसे दूर ले जाती है…


6.
याद तो आने के लिए है,
जाने के लिए तो लोग होते हैं।


7.
अब अलग हैं तो वक़्त से क्या शिकवा करना उसके लिए।


8.
समय तेरे संकेत पर ठहरा, और हम तेरे किनारे पर खड़े रह गए।


9.
वक़्त से नाराज़ी कैसे करूँ,
इज़्ज़त तो हमने उसने की है नहीं।

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