तन्हाई के पल से जब मिले हम,
दिल में न जाने कहाँ एक टीस हुई।
सोचा — प्यार की रचना किसने की?
उस दिन तुम्हारे प्यार की याद आई।
सोचा — किसने, कैसे, और क्यों बनाया?
कभी ख़ुशी की बारिश होती है,
कभी अपने ही लहू के आँसू की।
लेकिन एक बात मेरी समझ ज़रूर आई:
न किया होता प्यार हमने तुमसे,
शायद ऐसे कथन तो न होते;
यूँ रात को तन्हाई में जागे न होते,
तुम्हारी याद में यूँ तो न रोते।
न जाने कितने और ऐसे होंगे,
कितने ही मेरे जैसे अकेले होंगे।
मुझे नहीं पता, क्या होगा मेरा,
जीवन के किस मोड़ पर जाऊँगा।
पर यह नज़ाकत समझ तो आ गई —
इश्क़ से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती।
काश हमने भी इश्क़ न किया होता,
तन्हाई का दर्द हमें भी न होता,
वक़्त की चोट से यूँ रूबरू न होते,
न ही कोई हमें रुलाने वाला होता।
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