ज़िन्दगी को

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उस रात के अँधेरे से निकली एक आवाज़,
न जाने कौन था वो — एक अजनबी इंसान।
डरा-सहमा-सा मुझे था पुकार रहा,
रो-रो के, सहमा-सा मुझे निहार रहा।

वो डरी-डरी-सी आवाज़ गूँजती रही,
कुछ न होते हुए भी, डराती रही।
हर पल सोचने पर मजबूर करती —
क्या मेरा ही था वो प्रतिबिंब?

लेकिन क्यों थी उसकी ऐसी हालत,
आख़िर क्या था उसका कसूर?
सोचते-सोचते दिन महीनों में बदल गए,
उससे गुज़रते रहे हर रोज़, और हम रोते रहे।

आज समझ आया, कि वो था कौन —
मेरा ही हृदय था, मुझे पुकार रहा।
“जाग जा, अभी देर नहीं हुई” —
बस यही वो कहे जा रहा।

“अभी तो तूने कुछ किया ही नहीं,
फिर क्यों रहता है इतना परेशान?
सँभाल ख़ुद को, जी ले यह जीवन —
अभी बहुत कुछ बाक़ी है इस जीवन में।

हर पल मिलकर बनता है यह जीवन,
जी ले इस प्यारे-से उपहार को।
किस्मत अच्छी है तेरी, जो मिला है जीवन —
ज़िन्दगी के हर पल को कर दे प्यार के नाम।”

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