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  • ज़िंदगी, होड़ और ख़ुद

    1.
    किसी रोज़ अपनी शख्सियत से मसरूफ तो हो,
    ज़िन्दगी से जितने भी इल्म हैं, सब समझ जाएगा।


    2.
    शोर के बीच ये मेरी चुप्पी,
    सुनके मैं खुद ही चौंक जाता हूँ!
    सच तो होता नहीं बर्दाश्त तुम्हें,
    झूठ मैं बोल नहीं पाता हूँ…!


    3.
    चलो फिर चले घर, गुजारे एक दिन और सराय में,
    कुछ दिन और सही, गुजरे ये वक्त भी।


    4.
    कुछ लोग चल रहे हैं…
    कुछ और दौड़ रहे हैं…
    कुछ तो व्यायाम भी…
    एक शख्स अकेले बैठे ये सोच रहा है…
    अब आगे करना क्या है…


    5.
    वक्त-ए-हिसाब में रो पड़े,
    पैसे थे लगा बहुत कमाया जिंदगी भर,
    दरअसल उसके अलावा कुछ और था ही नहीं।


    6.
    दौड़ते-दौड़ते जिंदगी तो संभाल ली तुमने,
    अब ये बताओ तुम्हें कौन संभालेगा?


    7.
    रुसवा हो गए जिंदगी से ये भी देख लिया,
    फायदा तो चुप रहने में ही है।


    8.
    ख्वाब ने पूछ लिया कुछ नया नहीं?
    मैंने सोचा और नहीं बोला,
    सब या तो पूरे हो गए,
    या सब चकनाचूर हो गए।


    9.
    गुलाम हैं सब अपनी परछाई के,
    कहीं इनकी भी अपनी दुनिया तो नहीं?


    10.
    अए जिंदगी, तुझे समझाते-बूझते,
    कुछ इस कदर रूठ गया हूँ अपने आप से,
    अब तो इत्मिनान भी इज्तिरार में ही मिलता है…


    11.
    अब कहीं जाकर लगने लगा था,
    उससे उम्मीद रखना छोड़ दी मैंने,
    एक बार फिर उसने मौका दे दिया,
    कि उम्मीद रखनी इतनी भी बुरी नहीं…


    12.
    सुबह के बहाने तैयार हैं हर जाने के लिए इस जंग से,
    लेकिन एक कारण रोज़ दफ्तर की राह दिखलाता है,
    बन लो जनाब पैसा, इंसान से क्या-क्या करवाता है…


    13.
    डर-डर की, आदत सी हो गई है डर की,
    अब इस डर का कोई डर नहीं…

  • सुनहरी नौका

    अनोखे एक अद्वितीय सफर में, सुनहरी नौका पर सवार,
    शख्स बहुत निकले, फिर मजबूरी में आज।
    ठहर जाने किसी किनारे, मंज़िल की राह,
    ध्यान से देखा तो सोचते अब एक बात।
    भीड़ में ऐसे कितने हैं लोग, साथ मेरे,
    कुछ के चेहरे, कुछ की आंखें,
    कुछ और बोले भी तो क्या,
    एक ही सवाल सभी सोचते, क्यों?
    शाम होते सोचा भीड़ बन जाए आज,
    हिम्मत ने याद दिलाया, घर और ज़रूरतें भी हैं तेरे पास।
    हिम्मत वही पिघल गई, डूबते सूरज जैसी,
    फिर से निकल गए ख्वाबों के पुल बनाते।
    ज़िंदगी के किनारे पर सुनहरी नौका पर सवार।

  • मेरी ही ज़िद

    एक रोज़ उठा तो एक शख्स मेरे पास खड़ा था…
    अलग सी कद-काठी और चेहरा उसका,
    आंखें थीं लेकिन होंठ नहीं,
    बाल थे लेकिन भौंहें नहीं,
    मैं चौंका और पूछा, “कौन हो भाई?”
    धृष्ट वो आदमी वैसे का वैसा खड़ा रहा,
    गुस्सा आया और मैंने पकड़ा,
    फिर भी वह हिला नहीं वहां से।
    मैंने और जोर से कोशिश की,
    जितना उसके पास जाऊं उतना वह मुझपे हावी हो जाए।
    कुछ समझ नहीं पाया,
    तो हार कर पत्नी को जगाया,
    “देखो ये कौन है?”
    पत्नी ने नींद से उठकर बड़बड़ाई,
    “पागल हो गए हो, कोई नहीं है यहां।”
    यह कहकर वह फिर सो गई।
    मैं विचलित मन से उस शख्स को देखता रहा,
    सोचा कि क्या आफत गले पड़ गई,
    धर्म संकट में था तो संकट मोचन को भी याद कर लिया।
    कुछ समझ नहीं आया और शख्स मुझे देखे जाए,
    मेरा पारा चढ़ने लगा,
    और मैंने उसे एक मुक्का मार दिया,
    हुआ कुछ नहीं, मुझे ही दर्द हुआ।
    कराहते हुए बैठ गया और सोचा, “हैं क्या ये बला?”
    मानो जैसे जिद सी सवार हो गई हो मन में,
    बहुत सोचा और समझ आया,
    ये और कोई नहीं, मेरी ही जिद है जिंदगी की।

  • होड़

    होड़ लगी है नंबर लाने की,
    होड़ लगी है डिग्री पाने की,
    होड़ लगी है प्यार करने की,
    होड़ लगी है पैसा कमाने की,
    होड़ लगी है भव्य मकान बनाने की,
    होड़ लगी है बच्चों को सुंदर दिखाने की,
    होड़ लगी है बड़ा मंदिर मस्जिद बनाने की,
    होड़ लगी है दूसरों को छोटा दिखाने की,
    होड़ लगी है इसी होड़ में खो जाने की।

  • मैखाने में नादारद

    मैखाने में नादारद, एक दस्तक-सी ज़िन्दगी;
    कभी चंद ख़ुशनुमा लम्हों की मोहताज-सी।
    ग़म के नग़्मों में, अकेले एक साथ बन गई;
    और एक और जाम के इंतज़ार में, ज़िन्दगी बदलती गई…

    सितारों से पूछी मैंने अपनी तन्हाई की कहानी;
    उन्होंने कहा — यह राहगुज़र है वीरानियों की।
    कभी रात के साये में, चाँदनी की आरज़ू-सी;
    कभी सुबह के उजाले में, ख़्वाबों की तलाश-सी…

    राहों में बिछी चुप्पियों की चादर को,
    महसूस किया मैंने हर क़दम पर;
    साँसों में बसी एक अनकही तड़प,
    और दिल में छुपी एक बेक़रार चाहत…

    फिर भी, उम्मीद की किरणों से रोशन यह जीवन;
    हर दर्द में छिपा है एक नया सवेरा,
    हर आँसू के पीछे एक मुस्कान की चाह —
    और हर अँधेरे के बाद, एक नई सुबह की आस।

  • ज़िन्दगी का खेल

    ज़िन्दगी भी मस्त खेलती है —
    मैं चलना सीखता हूँ, ये भागने लगती है;
    मैं भागना सीखता हूँ, ये रुक जाती है;
    मैं रुकना सीखता हूँ, ये बदल जाती है;
    मैं बदलना सीखता हूँ, ये समझ नहीं आती;
    मैं समझना सीखता हूँ, ये उलझ जाती है;
    मैं सुलझाना सीखता हूँ — ये फिर चलने लगती है।
    मैं फिर चलना सीखता हूँ…

  • Life in If and Else

    One peaceful Monday morning, having ravishing food and enjoying a big brand name, I drifted slightly from my sober sight, and tried to explore the real-life meaning of adaptability and acceptability.

    And I drooled myself to sleep — only to be woken by office colleagues whispering that some senior was coming near. I woke with such a pace that I could have won a medal for it; I found my keyboard and mouse, and started staring blankly at my screen — at some import statements, instances, static members, and condition statements declared.

    If, and else? I was astonished — our life is also like this.

    Multiple ifs and elses: we call them planning, or restrictions. Instance variables are your relatives; static members are your family; and import statements are like education, degrees, friends, and so on. So our life is actually the execution of some code — in terms of if and else, deciding what will happen next — and problems arise with multiple executions, if multithreading is supported, and with all the advice, like annotations, directing our path.

    Multiple ifs and elses: if money, then switch — buy item one; and if money is greater than some amount, then buy this. If money is… and so the code of life keeps running.

  • Life is?

    Each day of life is like a tide in the sea. We don’t know how big it is, or how destructive — but we know that at the end of the day, when we have crossed the tide, we are near the shore, where we can relax for a while, realize how far we have come, having achieved one more success, and prepare ourselves for another day.

  • Fate and Art

    We are the masters of our fate,
    and of our art.

  • Same Day and Same Time

    A season of colour and love,
    time beading every moment with it;
    some faces are a crowd now,
    but still travelling in the time of the mind —
    just like flowing water through a pipe,
    I am ceasing my every dime,
    close to heart and life:
    the same day, and the same time.