बातों से भरा हुआ वो पिटारा रह गया,
कहने को बहुत कुछ था, बस इशारा रह गया।
शिकायतों का झोला हल्का हुआ करता था,
अब जो भरा तो सिर्फ़ ये कंधा बेचारा रह गया।
वो छोटी सी बात थी, कह देते तो निकल जाती,
कही नहीं गयी — सीने में शरारा रह गया।
दरिया तो बह गया, दोनों तरफ़ ख़ाली पड़ी,
तुम उस तरफ़, मैं इस तरफ़, बस ये किनारा रह गया।
सोचा था झोला खोल के रख दूँगा सामने तेरे,
तुम आये ही नहीं, दिल में गिला सारा रह गया।
‘अभय’ अब राह में हर एक से बात हो जाती है,
वो बात ही नहीं होती, बस एक गुज़ारा रह गया।
वही बात — खुली नज़्म में
बातों का पिटारा लिये फिरता था,
छोटी-मोटी जो भी होती, सब कह देना,
बात से बात का निकलना, वक़्त का गुज़र जाना,
अब उनसे बात हुए इतना अरसा… कि गिनना छोड़ दिया।
शिकायतों का झोला हल्का सा रहता था,
वक़्त-बेवक़्त, दिल की हर बात कह जाना,
यूँ ही कुछ भी मान लेना, हक़ से अपना कहना,
वक़्त के साथ झोला भरता गया… अब उठाया नहीं जाता।
अब भी छोटी-मोटी होती है, मगर किसको कह देना,
जेब में रख लेना, और भूल जाना,
हर बात अधूरी, होंठों तक आ के रुक जाना,
पिटारा वही का वही… बस अब खुलता नहीं।
कई बार सोचा, झोला खोल के सामने रख दूँ,
एक-एक शिकायत गिनवा दूँ, थोड़ा हल्का हो जाना,
फिर ख़याल आया — अब वो हक़ ही कहाँ रहा,
शिकायत किस से करना… और माफ़ी किस से माँगना।
अब दोनों कंधे पे हैं — एक ख़ाली, एक भरा,
अजीब है कि बोझ दोनों का एक सा,
रास्ते में जो मिले, उससे हाल कह देना,
पर वो बात नहीं होती… जो उनसे हुआ करती थी।
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