भरे बाज़ार में

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एक रोज़, शाम ढले वो मिली हमें फिर से,
क़िस्मत भी देखो — मिली भी भरे बाज़ार में।

नज़र मिली — या शायद मैं ही देखता रह गया।
मानो सूरज को खुली आँखों से देख लिया हो।
एक पल को आँख बंद कर ली —
पर सूरज बंद आँखों में भी जलता रहा।

मन को टटोला, तो लगा —
पास जाऊँ? गले लगाऊँ?
पूछूँ कैसी हो तुम,
कैसे चल रही है ज़िंदगी,
कुछ सुनूँ, कुछ सुनाऊँ,
सिलसिला यूँही चलता रहे,
उन्हें जताऊँ कि कितनी याद आती है,
उनका हाल-ए-दिल भी नापूँ,
उन्हें फिर हँसते देखूँ,
और फिर एक बार मैं भी हँसूँ,
और हँसते-हँसते दो आँसू आ जाएँ,
और वो पूछें, क्या हुआ,
और मैं उन्हें बताऊँ कि…

फिर नहीं।

मन वहीं धर दिया,
दूर से एक मुस्कान दी —
भीड़ थी, पता नहीं पहुँची भी या नहीं।
और चल दिए…
जैसे उस पहर, उस दिन, उस साल।

ख़ैर, बहुत दिन हो गए —
इतने, कि अब याद और गुमान में फ़र्क़ नहीं रहा।

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