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  • मै पंछी विशाल नील गगन का

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    मुझे आज इसमें समा जाने दो।
    आज मन-सागर के भावों को फूट-फूट कर,
    किरण की भाँति इस गगन में बह जाने दो।

    दूर कहीं है कोई मुझे पुकार रहा —
    ऐसा सोचते हुए मुझे उड़ जाने दो।
    आज खोल दो इस पिंजरे का ताला,
    विशाल नील गगन की सैर पर जाने दो।

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    ज्ञान-अज्ञान की परिभाषा से परे।
    मालूम है तो सिर्फ़ एक प्रेम की भाषा —
    आज मुझे फिर हवाओं पर सवार हो जाने दो।

    नफ़रत की भाषा का यह कैसा स्वरूप?
    मुझे न तुम लोग इसमें घसीट डालो।
    सोचने को हैं और भी बहुत-सी बातें, लेकिन
    मुझे आज इस आसमान में खो जाने दो।

    मैं पंछी विशाल नील गगन का,
    मुझे आज सिर्फ़ उड़ जाने दो।
    असीमित है मेरे मन का बल —
    मरने से पहले एक बार जी जाने दो।